Kabir das ke dohe

आज के इस पोस्ट में हम Kabir das ke dohe देखंगे तो आईये एक महान संत के मुखार बिंदु से निकले शब्दों से हम अपने बुद्धिमता को निखारे.

Kabir Das Ke Dohe

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर,

पंछी को क्षाया नहीं ,फल लगे अति दूर.

संत कबीर दास

Learning : आपके बुद्धिमत्ता का स्तर आपके उम्र पर नहीं आपके समझदारी पर निर्भर करता है मतलब हमे हर जगह समझदारी से काम लेनी चाहिए चाहे हम उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो।

कोई जरुरी नहीं है कोई बड़ा है तो ज्यादा समझदार है। बात बस इतना है कोई कितना जगा हुआ है कोई सोते सोते पूरी उम्र बिता दे और अपने जीवन से कुछ ना सीखे तो आप उसे समझदार नहीं कह सकते।

समझदारी उम्र के किसी पड़ाव पर लायी जा सकती है बशर्ते आपको हर क्षण जागने की कला सीखना होगा।

Kabir Das Ke Dohe
Kabir Das Ke Dohe

मूरख संग न कीजिये, लोहा जल न तिराई ,

कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहुँ भाई।

संत कबीर दास

Learning : हम जिस environment में रहते है, हमारी बुद्धि, चाल ढाल स्वभाव, और सोच उसी के अनुशार बदल जाती है. जैसे एक समान वर्षा की बूँद तीन अलग अलग संगति पाकर (केला ,शिप और नाग )

वह उसी रूप में ढल जाती है उसी प्रकार मनुष्य का स्वभाव उसके संगति के अनुशार बदल जाता हैं। इसलिए तो कहा जाता है

आप उन पांच लोगो का नाम बताओ और उनका सोच बताओ जिनके साथ आप ज्यादा से ज्यादा टाइम बिताते है हम आपका भविष्य बता देंगे। किसी महान इन्शान ने कहा है आप उन पांच लोगो का average है.

जिनके साथ आप ज्यादा से ज्यादा टाइम बिताते है. ध्यान रहे ये पांच लोग online या offline दोनों हो सकते है। कहने का मतलब ये है की किसी के साथ रहने का मतलब उसके विचारो का अनुशरण करना होता है।

किसी के साथ रहने का मतलब उसके विचारो के साथ रहना होता है. आप किसी के साथ रहते हुए उससे कोशो दूर रह सकते है और आप किसी से कोशो दूर रहते हुए उसके पास रह सकते है।

सारा खेल आपके चित का है आपके मन का है की आपका मन किसके साथ है। मुझे पूरा विश्वास है अब आप उन लोगो के साथ रहना और सुनना पसंद करेंगे जिनके तरह आप बनना चाह रहे है।

Kabir Das Ke Dohe

करता था तो क्यों रहया, जब करि क्यों पछिताय,

बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय।

संत कबीर दास

Learning : यदि तुम अपने को कर्ता समझते हो तो चुप क्यों बैठे हो अपने आप कर्म करके क्यों पश्चाताप करते हो अगर आपने बबूल का पेड़ लगाया है तो आप कहा से खाने को मिलेगा।

इसलिए जीवन किसी भी पड़ाव पर अगर आप से गलती हो गयी है तो बस उससे सिख कर आगे बढ़ना ही आपका काम है. जीवन के हर क्षण आपको सीखने के लिए तैयार।

जीवन का हर घटना आपको एक नया lession देने की कोशिश कर रही है। बस आप अपनी आँखे खुली रखो सिखने के लिए। जिसे आप

Sant Kabir Das Ke Dohe

Kabir Das Ke Dohe
Kabir Das Ke DoheKabir Das Ke Dohe

कबीर नाव जर्जरी, कूड़े खेवनहार,

हल्के हल्के तिरि गए, बूढ़े तिनि सर भार।

संत कबीर दास

Learning :जीवन की नौका टूटी -फूटी है उसे खेने वाला मुर्ख है। जो विषय वासनाओ से मुक्त है वो ही इससे तर पता है। इस दोहे के लर्निंग के सीरीज में मै आपको अष्टावक्र की एक व्यक्तांत बताता हूँ,

एक बार राजा जनक ने अष्टावक्र से पूछा की हे प्रभु “कथम ज्ञानम, कथम मुक्ति ” कैसे ज्ञान होता है, कैसे मुक्ति होता है इस पर अष्टावक्र बोले हे प्रिय यदि तू मुक्ति को चाहता है,

epustakalay.com इस लिंक के माध्यम से आप अष्टावक्र गीता पढ़ सकते है फ्री में.

तो विषयो को विष के सामान त्याग दे और क्षमा आर्जव दया संतोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर। अब यहां पर समझने वाली बात यह है की अष्टावक्र ने विषय को विष का नाम क्यों दिया।

क्या सच में विषय, विष के समान है. क्या सच में विषय हमे विष के सामान बार बार मारने का काम करती है. क्या सिर्फ विषयो को बार बार भोगने के चक्कर में हमे कई जन्म लेने पड़ते है और कई बार मरने पड़ते है.

इन सब सवालों का जवाब है ” हाँ “ तो आप कहेंगे तो इन्हे हम छोड़ क्यों नहीं देते है। इनसे हम लोग मुक्त क्यों नहीं हो जाते है. आखिर साक्षी भाव घटता क्यों नहीं है हमारे जीवन में।

जैसा की अष्टावक्र कहते है सिर्फ तुम सिर्फ साक्षी हो जाओ तुम अपने आप को करता मत समझो। देखिये साक्षी भाव या सिर्फ देखना इसलिए महत्वपूर्ण है जैसे मान लीजिये अँधेरा आपका अज्ञान है और दीपक का प्रकाश आपका ज्ञान है।

ज्योही आप दीपक को अँधेरे में ले जाते है तो अंधेरा अपने आप गायब हो जाता है। मतलब अज्ञान के अँधेरा को हटाने के लिए ज्ञान का छोटा सा दीपक का होना ही काफी है. उसी तरह जब आप सिर्फ साक्षी भाव से अपने आप को देखते है अपने मन को देखते है अपने वासनाओ को दखते है

तो अपने आप आपके वासनाओ का महल ढह जाता है। इसलिए अष्टावक्र ने साक्षी भाव को ज्यादा प्राथमिकता दिया है। क्योकि इससे मुक्ति सम्भव है और इससे सारी विषय वासनाओ से मुक्त हुआ जा सकता है।

इसलिए यहां कबीर साहब भी कह रहे है ” जो विषय वासनाओ से मुक्त है वो ही इससे तर पता है।

साक्षी भाव का घटना हमारे जीवन में बहुत आसान है इसमें दो चीज हमारे लिए बहुत मद्दतगार हो सकती है पहला या तो हमे कोई सत्य मार्ग दिखने वाला गुरु मिल जाये।

जो पग पग हमे संभाले हमे रास्ता दिखाए और हमारी गलतियों को बताये क्योकि किसी महापुरुष ने कहा है ” आपके जीवन में जितना आपके गलतियों का पता चले उतना अपने आप को सौभागयशाली समझो “

दूसरा या तो हम साक्षी भाव का बार बार अपने जीवन में अभ्यास करे. क्योकि मनुष्य होने का सबसे बड़ा फायदा है हम अपनी गलतियों से सिख सकते है सिर्फ समझदारी और ज्ञान से हम अपने चेतना को ऊपर उठा सकते है।

मेरी जितनी भी बुद्धि विवेक है मै अपने तरफ संत को समझाने की पूरी कोशिश किया है।

अंतिम विचार : Kabir Das Ke Dohe वाले पोस्ट को पढ़ने के लिए हम आपको को बहुत बहुत धन्यवाद देते है आप जीवन के रहस्यों को समझना चाहते है. और आप अपने आप से श्रेष्ठम से श्रेष्ठम संभावना की चाह रखते है और आपने हमे सेवा का मौका दिया यही मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है

मै इस सृष्टि के प्रति /Creator के प्रति बहुत कृतज्ञ हूँ की हमारी समूर्ण ऊर्जा एक सही दिशा में उपयोग हो रही है। आप इस पोस्ट को उन लोगो के पास जरूर साझा करें जिनके अंदर सत्य के प्रति गहरी प्यास है और अपने जीवन में महानतम से महानतम काम करना चाहते है।

हमारे टूटे – फूटे शब्दों के संग्रह को यहाँ तक पढ़ने के और curiousdaya ब्लॉग इतना सारा प्यार देने के लिए हम आपको बहुत बहुत धन्यवाद देते है। ❤️

Hey everyone, I'm Daya The founder of curiousdaya.com. हमसे जुड़ने के लिए और CURIOUSDAYA ब्लॉग को इतना सारा प्यार देने के लिए हम आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देते है. आप जीवन में अपने उच्चतम सम्भावना को छुए. हम इसी मंगल की कामना करते है. धन्यवाद !

Leave a Comment